मथुरा के एक मन्दिर में अभी कुछ दिन पहले ही खेली गयी होली के दौरान भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप बाल को कन्धो ंपर उठाकर भारी उत्साह के साथ होली खेलते भक्तो का अपाल जन समूह मथुरा। ब्रज में फाल्गुन मास शुरू होने पर भी होली के उमंग उत्साह को कहीं नहीं देखा जा रहा है जबकि ब्रज में बसन्तोत्सव के पर्व से ही होली की धूम, होली के कार्यक्रमों केा देखा जा रहा है लेकिन कुछ वर्षों से ब्रज में होली का रंग फीका पड़ने लगा है। लोगों ने रंग डालने को लेकर कोई उमंग नहीं है। यही वजह है कि होली का उमंग सिर्फ प्रमुख मंदिरों में ही देखने को मिल रहा है जबकि ग्राम, कस्बों, शहर के गली मौहल्लों में एक माह पूर्व से ही होली की तैयारी को लेकर लोग पैसा इकट्ठा करने, लकड़ी आदि इकट्ठा करने के कार्यों को करते थे। वहीं ग्रामों में एक माह पूर्व में ही रंग गुलाल का उत्सव प्रारंभ हो जाता था लेकिन वर्तमान के समय में लोगों में आपसी प्रेम की कमी एवं परेशानियों के चलते होली का रंग फीका पड़ने लगा है। अब तो होली का त्यौहार मात्र धूल वाले दिन ही देखने को मिलता है। यह त्यौहार, बरसाना, नंदगांव, दाऊजी, जन्मस्थान एव मंदिरों तक ही सीमित होकर रह गया है। जबकि पूर्व में इस दौरान ब्रज में होली की फुहार के रंगों से कोई भी अछूता नहीं रहता था। हास परिहास, होली गीत, होली रसियाओं की महफिलें तो जेसे ब्रज से नदारद होती जा रही हैं। हों भी क्यों नहीं। ब्रज आधुनिकता के रंग में रंगता जा रहा है। यहंा अब आधुनिकता के कार्यक्रम पाश्चात्य संगीत नांच के कार्यक्रम, फ्लैट संस्कृति के आने तथा वैलेंटाइन डे जैसे प्रेम के उत्सवों को बढावा दिया जा रहा है। यही वजह है कि ब्रज में अब होली की उमंग मंदिरों तक ही सीमित रह गयी है।
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