अपने देश की स्मृतियां परदेश में बिखरी पड़ी मिलें तो ख़ुशी तो होगी ही...। मेलबर्न में करीब 15 हजार आबादी वाले उपनगर 'मिचम' में घूमते हुए गलियों के नाम मेरठ स्ट्रीट, आगरा स्ट्रीट, लखनऊ, बनारस, दिल्ली, कलकत्ता, शिमला स्ट्रीट दिखाई देने लगें तो मन मयूर हो उठा। दनादन उन नाम लिखे खम्भों के फोटो खिंचवाए ताकि आपको दिखा सकूं। यूरोप के तमाम देशों में अपने देश से जुड़ी बातें दिखाई देती हैं लेकिन तीन करोड़ आबादी वाले ऑस्ट्रेलिया में अपने मुल्क के इतिहास से ताल्लुक रखने वाले चिह्न न के बराबर हैं। ऐसे में भारत के नगरों के नाम की पट्टिका 10 हजार किमी दूर इस देश में देख जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर एक उपनगर की तमाम स्ट्रीट ‘आगरा’, ‘मेरठ’ आदि ही क्यों है...? जानकारी करने पर मालूम हुआ कि सन 1860 में इस उपनगर को बसाया गया था। तब यहां गोल्ड रश अपने चरम पर था यानी ऑस्ट्रेलिया में इस जगह पर धरती सोना उगल रही थी। अंग्रेज इसको विकसित करने में जुटे थे और भारत में अंग्रेज स्वाधीनता संग्राम के (1857) आंदोलन को कुचलने की कामयाबी का जश्न मन रहे थे। इस आंदोलन में भारतीय वीरों की बहादुरी से वे घबरा भी गए थे। इसी घबराहट से पिंड छुड़ाकर बड़े ओहदे के गोरे फौजी ऑस्ट्रेलिया भी आ रहे थे। सन 1932 में ऐसा ही एक फौजी जो उत्तर भारत में कई स्थानों पर रहा था, मेलबर्न आया। यहां आने पर इस ब्रिटिश अफसर ने इस उपनगर 'मिचम' की बसावट में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस अज्ञात फौजी के मानस छाए हमारे देश के यह नगर यहां इतिहास बन गए और हमारी खुशी का एक भाग। आज यह उपनगर 'मिचम' मेलबर्न के इतिहास का सुनहरा पन्ना तो है ही साथ ही यहां अनेक कलाकार, लेखक और साहित्यकार रहते हैं। ऑस्ट्रेलिया के जननायक नेड केली पर बनी फीचर फिल्म "दी स्टोरी ऑफ़ नेड केली' की शूटिंग इन्हीं स्थानों पर हुई थी। यह फिल्म दुनिया की पहली फीचर फिल्म मानी जाती है। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे मेलबर्न जिसकी गिनती दुनिया के सर्वाधिक खूबसूरत और रहने योग्य नगरों में की जाती है के इस उपनगर ‘मिचम' में गलियों के खम्भों पर लिखे नाम नहीं बल्कि अपने देश का तिरंगा है।
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