गोवर्धन : गिरिराज धाम में आगामी 7 जुलाई से शुरू हो रहा गोवर्धन का करोड़ी मुडिया पूर्णि़मा मेला की तैयारियों में आलाधिकारी महीनों से कार्य पूरा करने में लगे हुए है। लेकिन, अभी तक कार्य पूरा नहीं हो सका है।
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गोवर्धन : गिरिराज धाम में आगामी 7 जुलाई से शुरू हो रहा गोवर्धन का करोड़ी मुडिया पूर्णि़मा मेला की तैयारियों में आलाधिकारी महीनों से कार्य पूरा करने में लगे हुए है। लेकिन, अभी तक कार्य पूरा नहीं हो सका है।
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कान्हा की नगरी गिर्राज धाम में कूडे के ढेर पर भोजन तलाशती एक गाय गोवर्धन। श्रीकृष्ण की नगरी गिर्राज धाम गोवर्धन में भगवान श्रीकृष्ण की सर्व प्रिय गो माता की दुर्दशा का हाल किसी से छिपा नही है। गिर्राज महाराज की तलहटी में गायों के नाम पर अपनी जीविका चलाने वाली स्वयं सेवी संस्थाऐं भी गो भक्तों को काफी ठेस पहुंचा रहे है। जिस गौ माता के नाम पर ये संस्थाऐं करोडों रूपये का चन्दा इकट्टा कर रहे है। आज वही गो माता पूरे ब्रज क्षेत्र में दर दर की ठोकरें खाने को विवश नजर आ रही है। गिर्राजधाम में गायों को चारे की बजाए पोलीथीन, कचरे के ढेर के सहारे अपना जीवन व्यतीत करना पड रहा है। ये स्वंय सेवी संस्थाऐं न जाने कोन सा पाठ गौ भक्तों को पढाते जो कि अपनी सुद बुद खोकर लाखों करोडों रूपये की धन राशि दान के रूप में इन संस्थाओं के लिए दे देते है। लेकिन ये स्वयं सेवी संस्थाऐं इस पैसे का उपयोग अपने निजी स्वार्थाे में करते नजर आते है। अगर ये स्वयं सेवी संस्थाऐं इस पैसे का पूर्ण रूप से गाय के हित में खर्च करें तो श्रीकृष्ण की नगरी में गाय की इतनी दर्दशा न हो कि उसे अपने पेट को भरने के लिऐ कूडे कचडे के ठेर पर भोजन खाना पडे। इन दान वीरों को तो इस बात से भी कोई फर्क नही पडता है कि उनका पैसा गाय के हित में भी लग रहा है या नही। ये कौन सा धर्म है कि सिर्फ धन राशि देने से ही पापों से मुक्ति मिल जाती है। चाहे उस पैसा का ये निजी संस्थाऐं अपने निजी स्वार्थ के लिऐ खर्च कर रही हो। जबकि धर्म गुरूओं की माने तों अपने हाथों से किया गया दान ही सर्वाेपरि होता है। जब ब्रज में इतनी गौशालाऐं होने के बाद भी हमारे ब्रज की गायें कूडे के ढेर पर भोजन कर अपना जीवन व्यतीत करती है तो ये दान भी किस काम का है।
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देष की राजधानी दिल्ली में यमुना श्रीनाथ बाबा को अरोगने हेतु नीचे पधरायी गई झारीजी एवं बंटा गोकुल में 2003 में निर्मित ’गोकुल बैराज’ जिसके बनने से यमुना मेंभारी प्रदूशण बढ़ा मथुरा का श्रीमदनमोहनजी का घाट जहाँ से पधराकर श्रीयमुनाजल लाया जाता था ब्रज क्षेत्र से श्रीनाथ जी बाबा को झारीजी में आरोगने को यमुना जल पधराकर लाया जाता था जो कि विगत 11 वर्षों से ब्रज क्षेत्र में प्रदूषण के चलते अब बन्द है। उल्लेखनीय है कि ब्रजक्षेत्र में श्रीयमुना जी का अधिदैविक स्वरूप है एवं श्रीयमुनाजी भगवान् श्रीकृष्ण की चतुर्थ प्रिया हैं। अनादिकाल से अर्थात् जब से श्रीनाथजी को मीराबाई पधराकर ब्रज से लाई तब से ही बैलगाड़ी के माध्यम से श्रीनाथजी को झारीजी में अरोगने के लिए ब्रज से श्रीयमुना जल की गागर पधराकर लाई जाती रही थी। और उसी यमुनाजी के आधिदैविक स्वरूप से श्रीनाथजी की झारीजी भरी जाती रही है। यह बैलगाड़ी लगभग 10-11 दिनों के अन्तराल में नाथद्वारा पहुँच पाती थी। सत्तर के दशक से जब राजस्थान राज्य परिवहन निगम ने वृन्दावन उदयपुर बस सेवा प्रारम्भ की तो बस में ही चालक की सीट के पास ही एक केबिन बनाया गया था जिसमें अपरस में मथुरा के श्रीमदनमोहनजी के घाट से भरकर गागर में श्रीयमुना जल पधराकर लाया जाने लगा था जो कि प्रतिदिन उसी दिन श्रीनाथ जी के मन्दिर में पहुँचता था। बाद में जब उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन की बस सेवा प्रारम्भ हुई तो उस बस में भी यही व्यवस्था की गई आज भी एक दिन राजस्थान परिवहन तो एक दिन उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन की बस सेवा उदयपुर तक आती है परन्तु सन् 2003 में जब से मथुरा में गोकुल नामक स्थान पर यमुना नदी के ऊपर एक बैराज का निर्माण किया गया है तब से यमुना में पानी का प्रवाह रुक जाने के कारण इतना अधिक प्रदूषण बढ़ गया है कि श्रीनाथजी ने उस प्रदूषित जल को अरोगना ही बन्द कर दिया। तब से हरियाणा के यमुनानगर के निकट से लारी के माध्यम से यमुनाजल जो कि यमुना का मात्र नदी जल स्वरूप ही है न कि ब्रज की यमुना का आधिदैविक स्वरूप आज श्रीनाथजी को झारी जी में धराया जाता है। श्रीनाथजी के पूर्व बड़े मुखियाजी श्री नरहरि पी. ठाकर ने जो कि ब्रज लाइफ लाइन वैलफेयर नामक संस्था के सदस्य एवं संरक्षक मण्डल में भी शामिल हैं ने संस्था के संयोजक महेन्द्रनाथ चतुर्वेदी के समक्ष अपनी पीड़ा ज़ाहिर करते हुए कहा कि चतुर्वेदीजी आज श्रीनाथजी बाबा को ब्रज की आधिदैविक रूवरूप की श्रीयमुनाजी झारीजी में पिछले 11 वर्षों से नहीं धरायी जाती है। पूर्व मुखियाजी ने भारी मन से कहा कि हमने यमुनानगर में पानी की जाँच कराकर झारीजी के जल की व्यवस्था तो कर ली है परन्तु पता नहीं श्रीजीबाबा को ब्रज की आधिदैविक स्वरूप की श्रीयमुनाजी अरोगने हेतु कब उपलब्ध होगी कुछ कह नहीं सकते। उल्लेखनीय है कि ब्रज लाइफ लाइन वैलफेयर नामक संस्था यमुना प्रदूशण की लड़ाई पिछले तीन दषक से अधिक समय से लगभग 32 वर्षों से लड़ रही है जिसे देष की शीर्ष अदालत ने 8 मार्च 2013 को स्वयं के दाखिल यमुना प्रदूषण के केस संख्या 725/1994 में पार्टी के रूप में सामने से संस्था को दो बार एडवाइज देकर शामिल कर लिया है। ब्रज लाइफ लाइन वैलफेयर संस्था के संयोजक श्री चतुर्वेदी के अनुसार आज सरकारों को लोगों की धार्मिक भवनाओं का जरा भी ध्यान नहीं है। आज देष के सभी वल्लभकुल सम्प्रदाय के मंदिरों में झारी जी के लिए जल हथिनीकुण्ड से मँगवाना प्रारम्भ कर दिया है जिससे वैष्णवों की धर्मिक भावनाएँ आहत हो रहीं हैं।
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छपरा रू बिहार के छपरा में डिब्रूगढ़ राजधानी के नौ डिब्बे पटरी से उतर गए हैं। इस हादसे में आठ घायल जबकि पांच यात्रियों की मौत हो गई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हादसे पर दुख जताया है और लगातार रेलमंत्री के संपर्क में हैं। हादसा रात करीब दो बजे छपरा के पास हुआ। इस हादसे पर रेलवे की ओर से बयान आया है कि इस हादसे में साजिश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि दिल्ली.डिब्रूगढ़ राजधानी एक्सप्रेस हादसे के लिए माओवादियों को जिम्मेदार ठहराना जल्दबाजी होगी। वहीं घटनास्थल पर पहुंचे छपरा के सांसद राजीव प्रताप रूडी ने दिखा कि पटरी कटी हुई है। लिहाजा इसमें जांच होगी तो साजिश की बात साफ हो सकती हैए हालांकि उन्होंने कहा कि इस मामले की जांच गुरुवार से शुरू होगी। इससे पहले रेलवे के अधिकारियों ने भी इस हादसे को साजिश बताया थाए जबकि स्थानीय पुलिस प्रशासन साजिश से इनकार कर रहा है। उधरए रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अरूणेंद्र कुमार ने बताया कि बिहार के मोतिहारी में भी एक माल गाड़ी के 18 डिब्बे पटरी से उतरे हैं। एक तरफ छपरा का हादसा और दूसरी तरफ मोतिहारी में मालगाड़ी पटरी से उतरी है। ऐसे में किसी साजिश से इनकार नहीं किया जा सकता। इस इलाके में नक्सलियों ने 24 और 25 जून को बंद बुलाया था। इस हादसे में घायल हुए नौ यात्रियों को छपरा के सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। साथ ही इनके इलाज के लिए रेलवे की मेडिकल टीम मौके पर रवाना हो गई है। फिलहाल हादसे की जगह पर फंसे यात्रियों को सोनपुर स्टेशन लाया जा रहा हैए जहां से उन्हें उनकी मंजिल तक भेजा जाएगा। रेलवे ने हादसे के बाद मुआवजे का ऐलान किया है। हादसे में मरने वालों के परिजनों को 2−2 लाख रुपयेए गंभीर रूप से घायलों को 1−1 लाख रुपयेए जबकि मामूली रूप से घायलों को 20−20 हजार रुपये मुआवजा दिया जाएगा। हादसे के बाद छपरा के बीजेपी सांसद राजीव प्रताप रूडी घटनास्थल पर पहुंचे। साथ ही उन्होंने जानकारी दी कि उन्होंने प्रधानमंत्री को इस मामले की जानकारी दे दी है और सभी एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं। छपरा में राजधानी एक्सप्रेस हादसे के बाद रेलवे ने हेल्पलाइन नंबर जारी किए गए हैं। लखनऊ 09794830976ए वाराणसी 0542−2226778ए 2224742ए नई दिल्ली 011−23342954 030−22280ए छपरा 06152−243409ए हाजीपुर 06224−272230
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नई दिल्ली रू पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अंतर्गत पेट्रोलियम नियोजन और विश्लेषण प्रकोष्ठ ;पीपीएसीद्ध द्वारा आज संगणितध्प्रकाशित सूचना के अनुसार भारतीय बॉस्केट के लिए कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमत 23 जून को घटकर 111ण्75 अमरीकी डॉलर प्रति बैरल रह गई। यह पिछले कारोबारी दिवस 20 जून की कीमत 111ण्86 अमरीकी डॉलर प्रति बैरल से कम है। रुपए के संदर्भ में कच्चे तेल की कीमत 23 जून को मामूली रूप से घटकर 6726ण्23 रुपए प्रति बैरल हो गईए जबकि 20 जून को यह 6742ण्92 रुपये प्रति बैरल थी। रुपए 20 जून के 60ण्28 रुपये प्रति अमरीकी डॉलर की तुलना में 23 जून को मजबूत होकर 60ण्19 रुपये प्रति अमरीकी डॉलर पर बंद हुआ।
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मनीष देसाई नई दिल्ली : हाल की गुजरात यात्रा में अहमदाबाद में मेरे पास एक दिन का खाली समय था और मैं इसका बेहतर इस्तेमाल करना चाहता था। मेरे सहयोगी जगदीश भाई ने सुझाव दिया कि एक दिन में पाटन स्थित रानी की वाव तथा मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर देखा जा सकता है। उनके सुझाव पर कोई दो राय नहीं थी। मैंने रानी की वाव के बारे में पढ़ रखा था और एनडीटीवी की भारत की आश्चर्य श्रृंखला धारावाहिक में रानी की वाव के बारे में देख रखा था। गूगल पर खोज में यह जाहिर हुआ कि भारत सरकार ने यूनेस्को की विश्व विरासत स्थलों में रानी की वाव को शामिल करने का अनुरोध किया है। टेलीविजन पर भी गुजरात पर्यटन के 'खुशबू गुजरात की' अभियान में अमिताभ बच्चन ने रानी की वाव का प्रचार प्रसार किया। दो घंटे के सफर में कलोल, ऊंझा तथा मेहसाणा होते हुए हम पाटन शहर पहुंचे। पाटन कभी गुजरात की राजधानी होता था। सूर्य की लुकाछिपी के बीच हम बड़े मैदान पर पहुंचे, जहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की एक पट्टिका लगी थी, जहां वाव में जाने के रास्ते बताए गए थे। रानी की वाव 64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी तथा 27 मीटर गहरी है। मूल रुप से इसे सात मंजिला बनाया गया था, लेकिन अब हम यह पांच मंजिला ही है। रानी की वाम की सीढ़ियों से नीचे उतरते ही अपने आपको एक अलग दुनिया में पाया। अगला एक घंटा तो बिलकुल वरदान था। यह सुसज्जित इमारत है और इसमें मारु-गुर्जर शैली की वास्तुकाल है। अधिकतर मूर्तिकलाओं में विष्णु भक्ति दशावतार रुप में दिखती है। इसमें वराह, नरसिंह, राम तथा कलकी की तस्वीरें हैं। इसमें महिषासूर मर्दनी द्वारा राक्षस महिषासूर का बध करते दिखाया गया है। रानी की वाव में अप्सरा का भी चित्र है और इसमें 16 प्रकार के श्रृंगार दिखाए गए हैं। जल स्तर के निकट शेरषाशयी विष्णु की भी तस्वीर हैं। 2001 तक सैलानी वाव में नीचे जल तक जा सकते थे, लेकिन भुज में आए भूकंप के दौरान ढ़ांचे में कमजोरी आ गई और अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने एक सीमा तक ही प्रवेश की अनुमति दे ऱखी है, लेकिन इससे पत्थर में समाए लय, सुंदरता तथा भाव को आप देख सकते हैं। इस स्थल को देखते ही यह याद आता है कि हमारे पूर्वजों ने जल को कितना पवित्र माना था। इन्हें मूल रुप से साधारण कुंड के रुप में बनाया गया था। लेकिन इसे बाद के वर्षों में जल की पवित्रता से जोड़ते हुए विकसित किया गया। वैसे तो अनेक राजाओं द्वारा रानियों की याद में स्थल बनाए गए, लेकिन रानी की वाव कुछ अलग है। माना जाता है कि इसे रानी उदयमति ने अपने पति भीमदेव-1 की स्मृति में बनवाया। भीमदेव-1 पाटन के सोलंकी वंश के संस्थापक थे। 1304एडी में मेरुंग सूरी की रचना 'प्रबंध चिंतामणि' में भीमदेव-1 की स्मृति में उदयमति द्वारा बनाए गए स्थलों का वर्णन है। बाद में इसमें सरस्वती नदी का पानी आ गया और 1960 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसकी खुदाई की। अनुमान लगाया जाता है कि वाव में आठ सौ मूर्तिकलाएं थीं, इनमें से पांच सौ कलाएं पुरानी स्थिति में हैं। यह संरक्षित स्थल है और इसमें अच्छे कार्यों के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सराहना करनी चाहिए। संरक्षण प्रयासों के अतिरिक्त एएसआई ने स्कॉटलैंड की सहायता से वाव का डिजिटल नक्शा तैयार किया है। इससे इसकी बेहतर समझदारी और संरक्षण में मदद मिलेगी। रानी की वाव गुजरात का गौरव रहा है। 2012 में बडोदरा सर्किल के पूर्व पुरातत्व अधीक्षक केसी नौरियाल की अगुवाई में एएसआई के एक दल ने यूनेस्को की मंजूरी के लिए खाका तैयार किया। चीन के तीसूंग्गा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर झांग झी के नेतृत्व में यूनेस्को की विश्व विरासत समिति का सलाहकार दल पाटन आया और स्थल का व्यापक अध्ययन किया। इस दल ने स्थानीय लोगों से भी बातचीत की और जाना कि रानी की वाव उनके लिए किस महत्व का है। अंत: 22 जून, 2014 को यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने दोहा में अपनी 38वीं बैठक में रानी की वाव को विश्व विरासत स्थल का दर्जा दिया। यूनेस्को ने टिप्पणी की कि सीढ़ियों वाले कुएं भूमिगत जल स्रोत के विचित्र प्रकार हैं और इन्हें तीन हजार ईसा पूर्व से ही बनाया जाता रहा। रानी की वाव को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल करने के चंद मिनटों के अंदर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट किया 'यह हमारे लिए गौरव की बात है, जब आप अगली बार गुजरात जाएं तो हमारी महान कला और संस्कृति की प्रतीक रानी की वाव देखने जरुर जाएं।' निश्चित रुप से जब आप रानी की वाव से बाहर आते हैं तो आप कुओं के बारे में अपने साथ नई समझदारी लाते हैं। यह कि कुएं हमेशा अंधेरे, गहरे और रहस्यपूर्ण नहीं होते। रानी की वाव 11वीं शताब्दी की सोलंकी कला का बेहतरीन नमूना है। लेखक मुंबई में निदेशक {संचार} हैं।
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