धर्म, कला और संस्कृति

सनातनी परंपरा में ‘चिरंजीवी’ उसे कहा जाता है जो अमर हो अर्थात जिसका कोई अंत न हो। वैदिक परंपरा में ऐसे आठ चिरंजीवियों का उल्लेख आता है। ये आठों व्यक्तित्व किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे, दिव्य शक्तियों से संपन्न हैं। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है, वे सारी शक्तियां इनमें विद्यमान है। जो लोग परामनोविज्ञान को जानते और समझते हैं, वे इन पर विश्वास करते हैं।

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ब्रज में एक लोकोक्ति बहुत प्रसिद्ध है – “हलुआ में हरि बसत हैं, घेबर में घनश्याम। मक्खन में मोहन बसैं, रबड़ी में श्री राम।। यहां बात हो रही है भगवान की खान-पान से संबंधित रुचियों की। और, यदि भगवान के खान-पान की बात चले तो सबसे पहले याद आता है ‘छप्पन भोग’...

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होली के सात दिन बाद बसौड़ा त्योहार मनाया जाता है। इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती है और कुत्ते को खाना खिलाकर पूजा जाता है...

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होली का त्योहार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यहां हम आपको इस दिन की संपूर्ण पूजा विधि के बारे में बता रहे हैं...

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भगवान श्रीकृष्ण कभी एक ‘गुरु’ की भूमिका में नजर आते हैं, कभी ‘सखा’, कभी एक भाई और कभी युद्ध में मैदान रण छोड़ने वाला ‘रणछोड़’ के रूप में। भगवान के इसी रूप को समर्पित गुजरात के खेड़ा जिले स्थित डाकोर धाम में एक कृष्ण मंदिर है जिसे ‘रणछोड़दास का मंदिर’ कहा जाता है...

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होली के त्योहार को महज कुछ ही दिन शेष रह गए हैं, ऐसे में होली का जिक्र हो और बात कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा की न हो, फिर तो होली का रंग ही फीका है। होली के असली रंग तो नंदलाल की नगरी मथुरा में ही हैं...

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होली आई खुशियां लाई..., जी हां, होली जब भी आती है, पूरे देश में एक अलग सी खुमारी छा जाती है। हर कोई एक अलग अंदाज में होली की मस्ती में सराबोर नजर आता है। कोई फूलों से होली खेलता है, तो कोई ढोल नगाड़ों की धुन पर नाच-गाकर रंगों के त्योहार में खो जाता है। कोई भांग की मस्ती में झूमकर, तो कोई रंग-बिरंगे लाल-गुलाबी रंगों से इस पावन त्योहार को मनाता है। सभी के तौर तरीके भले ही अलग हो, लेकिन मकसद सिर्फ एक ही होता है, कि कैसे होली के बहाने अपनों को और करीब लाया जाए और सबके जीवन को खुशियों से हरा-भरा बनाया जाए...

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अबीर-गुलाल, संगीत और नृत्य से भरपूर पारम्परिक लोकोत्सव होली का असली आनंद तो ब्रज में ही मिलता है। कृष्ण नगरी के मंदिरों में एक माह से भी अधिक समय तक चलने वाले इस उत्सव में ठाकुरजी अपने भक्तों के साथ नित्य होली खेलते हैं...

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लोकनायक श्रीकृष्ण ने जब बृज में अवतार लेकर इस स्थान को अपनी मधुर लीलाओं का केन्द्र बनाया तो यहां की नैसर्गिक सुषमा अनंतगुनी हो गई। प्रेमी रसिक भक्तों की कौन कहे स्वयं महालक्ष्मी भी यहां नित्य निवास करने लगीं। जब समस्त कला गुरुओं के गुरू यहां आ गए तो कलाएं उनसे पृथक कैसे रह सकती थीं। कृष्ण का पूरा जीवन विभिन्न रूपों में गायन, वादन एवं नृत्य कला के साथ जुड़ा हुआ है...

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देशभर में मूर्तिकला पर भगवान श्रीकृष्ण का एक बड़ा असर रहा है। इनमें बंगाल की मिट्टी से बनी मूर्तियों से भला कौन परिचित नहीं होगा। राधाकृष्ण, बालगोपाल और चैतन्य महाप्रभु की मूर्तियां पूरे भारत को यहां के कलाकार भेजते हैं...

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