धर्म, कला और संस्कृति

भगवान श्रीकृष्ण कभी एक ‘गुरु’ की भूमिका में नजर आते हैं, कभी ‘सखा’, कभी एक भाई और कभी युद्ध में मैदान रण छोड़ने वाला ‘रणछोड़’ के रूप में। भगवान के इसी रूप को समर्पित गुजरात के खेड़ा जिले स्थित डाकोर धाम में एक कृष्ण मंदिर है जिसे ‘रणछोड़दास का मंदिर’ कहा जाता है...

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होली के त्योहार को महज कुछ ही दिन शेष रह गए हैं, ऐसे में होली का जिक्र हो और बात कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा की न हो, फिर तो होली का रंग ही फीका है। होली के असली रंग तो नंदलाल की नगरी मथुरा में ही हैं...

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होली आई खुशियां लाई..., जी हां, होली जब भी आती है, पूरे देश में एक अलग सी खुमारी छा जाती है। हर कोई एक अलग अंदाज में होली की मस्ती में सराबोर नजर आता है। कोई फूलों से होली खेलता है, तो कोई ढोल नगाड़ों की धुन पर नाच-गाकर रंगों के त्योहार में खो जाता है। कोई भांग की मस्ती में झूमकर, तो कोई रंग-बिरंगे लाल-गुलाबी रंगों से इस पावन त्योहार को मनाता है। सभी के तौर तरीके भले ही अलग हो, लेकिन मकसद सिर्फ एक ही होता है, कि कैसे होली के बहाने अपनों को और करीब लाया जाए और सबके जीवन को खुशियों से हरा-भरा बनाया जाए...

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अबीर-गुलाल, संगीत और नृत्य से भरपूर पारम्परिक लोकोत्सव होली का असली आनंद तो ब्रज में ही मिलता है। कृष्ण नगरी के मंदिरों में एक माह से भी अधिक समय तक चलने वाले इस उत्सव में ठाकुरजी अपने भक्तों के साथ नित्य होली खेलते हैं...

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लोकनायक श्रीकृष्ण ने जब बृज में अवतार लेकर इस स्थान को अपनी मधुर लीलाओं का केन्द्र बनाया तो यहां की नैसर्गिक सुषमा अनंतगुनी हो गई। प्रेमी रसिक भक्तों की कौन कहे स्वयं महालक्ष्मी भी यहां नित्य निवास करने लगीं। जब समस्त कला गुरुओं के गुरू यहां आ गए तो कलाएं उनसे पृथक कैसे रह सकती थीं। कृष्ण का पूरा जीवन विभिन्न रूपों में गायन, वादन एवं नृत्य कला के साथ जुड़ा हुआ है...

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देशभर में मूर्तिकला पर भगवान श्रीकृष्ण का एक बड़ा असर रहा है। इनमें बंगाल की मिट्टी से बनी मूर्तियों से भला कौन परिचित नहीं होगा। राधाकृष्ण, बालगोपाल और चैतन्य महाप्रभु की मूर्तियां पूरे भारत को यहां के कलाकार भेजते हैं...

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