धर्म, कला और संस्कृति

भगवान कृष्ण के जन्म के विषय में प्रचलित कथा से तो हम सब भली भांति परिचित हैं। लेकिन, हम में से बहुत लोग यह नहीं जानते कि उनकी मृत्यु आखिर किस प्रकार और कहां हुई थी...

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वृंदावन स्थित कात्यायनी देवी मंदिर का नाम प्राचीन सिद्धपीठ के अंतर्गत आता है। यह मंदिर माता के 51 शक्तिपीठों में से एक है...

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नवरात्रि के दिनों में कन्हैया की नगरी मथुरा देवी नगरी बन जाती है। यहां के कई देवी मंदिरों में देर रात तक पूजा-अर्चना के कार्यक्रम चलते रहते हैं।

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प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों तक कैसे पहुंचती हैं? कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं–कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिण्ड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है? इस शंका का स्कन्दपुराण में बहुत सुन्दर समाधान मिलता है...

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अक्सर मन में प्रश्न उठता है कि यदि पुनर्जन्म है और आत्मा को दूसरा शरीर ग्रहण करना ही होता है तो फिर श्राद्ध कर्म का प्रयोजन क्या है? या यदि वह आत्मा विशेष सदा आत्मा ही रहती है तो क्या पुनर्जन्म की अवधारणा बिल्कुल ग़लत है?

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भगवान श्रीकृष्ण को प्रेम, धर्म, राजनीति, समाज और नीति-नियमों की व्यवस्था करने वाला माना जाता है। उनका दर्शन मानव जीवन का आधार है। वह केवल एक राजनीतिक, आध्यात्मिक और योद्धा ही नहीं थे, उन्हें हर तरह की कलाओं में पारंगत भी माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण से धर्म का एक नया रूप और संघ शुरू होता है...

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